इतिहास के झरोखों से अशफाक तुम क्यों एक हिन्दू के बहकावे में आकर अपनी जान दे रहे हो
अक्सर लोग कहते है कि मजहब रास्तों में दीवार बनकर आ जाता है लेकिन आज से करीब 100 साल पहले दो क्रांतिकारियों ने इस दावे को पूरी तरह गलत साबित कर दिया था।
एक क्रांतिकारी पक्के अस्तित्व और रोज सुबह संध्या वंदन करने वाले पंडित रामप्रसाद बिस्मिल थे तो दूसरी तरफ पांच वक्त की नमाज के पाबंद और इस्लाम के पक्के अनुयायी अशफाक उल्ला खां वारसी थे।
लेकिन जब ये दोनों मिलते थे तो मज़हब पीछे छूट जाता था और सिर्फ एक ही रंग नजर आता था सिर्फ और सिर्फ वतन का रंग 09 अगस्त 1925 को हुए काकोरी काण्ड के बाद जब इन दोनों महान क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया।
तो अंग्रेजो ने अपनी पुरानी फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई,कह जाता है कि जेल के एक अंग्रेजी अफसर या नुमाइंदे ने अशफाक उल्ला खां के कान में जहर घोलने की कोशिश करते हुए कहा था।
अशफाक तुम क्यों एक हिन्दू (बिस्मिल) के बहकावे में आकर अपनी जान दे रहे हो वो तो अपने धर्म और हिन्दुओं का राज चाहते हैं
अशफाक उल्ला खां का वो जवाब आज के हर भारतीय के लिए एक मिसाल है उन्होंने तपाक से मुस्कुराते हुए जवाब दिया था।
राम प्रसाद बिस्मिल मेरा भाई है वो जिस आजाद भारत का सपना देख रहे हैं वहीं सपना मेरा भी है, तुम मेरी गर्दन काट सकते हो लेकिन हमारी रूहों और हमारे भाइयों जैसे पाक रिश्ते को कभी जुदा नहीं कर सकते।
फांसी से कुछ दिन पहले जब राम प्रसाद बिस्मिल से फैजाबाद जेल में उनकी मां मिलने आई तो उनकी आंखों में आसूं थे,यह देख उनकी मां ने स्वाभिमानी लहजे में डांटते हुए कहा बेटा आज आंसू क्यों? क्या तुम मौत से डर गये।
बिस्मिल ने तुरंत जवाब दिया, नहीं मां डर मौत का नहीं है मलाल सिर्फ इस बात का है कि मेरा भाई अशफाक मुझसे दूर फैजाबाद की बजाए किसी दूसरी जेल में बंद हैं काश हम दोनों एक ही फंदे पर एक साथ झूलते।
इतिहास के पन्नों और संस्मरणों के मुताबिक राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की यह बेमिसाल दोस्ती केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं थी बल्कि वे परिवारिक स्तर पर एक दूसरे के सुख दुख के साथी थे।
अशफाक उल्ला की डायरी और उनके संस्मरणों में बिस्मिल के प्रति उनके अगाध प्रेम और देश के प्रति समर्पण के प्रमाण साफ मिलते हैं।
19 दिसंबर 1927 को इन दोनों अमर शहीदों ने देश की आजादी के लिए हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया, अशफाक उल्ला खां ने फांसी पर चढ़ने से पहले कहा था।
कि मेरे हाथ बिल्कुल नहीं कांप रहे हैं, क्योंकि मैं अपने वतन के लिए कुर्बान हो रहा हूं वही राम प्रसाद बिस्मिल की जुबान पर आखिरी वक्त में वहीं अमर पंक्तियां थीं, *सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है।
ज़ोर कितना बाजु - ए - कातिल में है,आज जब हम छोटी छोटी बातों पर एक दूसरे से लडते है तो हमें सोचना होगा कि क्या बिस्मिल और अशफाक की शहादत किसी एक धर्म विशेष के लिए थी?
उनकी शहादत और उनका सपना सिर्फ और सिर्फ एक स्वतंत्र संप्रभु और सांझा हिन्दुस्तान के लिए था बिस्मिल और अशफाक की इस अमर दास्तां को पढ़कर क्या आज भी धर्म के नाम पर बंटना चाहिए?
क्या हम दोबारा वही सांझा और खूबसूरत हिन्दुस्तान नहीं बना सकते जिसका सपना इन दो सच्चे दोस्तों ने देखा था इस दास्तां का प्रकाशन करने के पीछे हमारा मकसद सिर्फ इतना ही कि जिन उद्देश्यों से हमारे सच्चे वतन परस्तो ने अपनी जान न्यौछावर कर कर दी क्या।
हम उनके सपनों को एक सूत्र में पिरोकर भारत को विश्व गुरु बनने में अहम भूमिका अदा करे दर्शकों से निवेदन है कि अपनी राय से हमें जरूर अवगत कराएं।